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"परिंदे की फ़रियाद"

By Unknown - No Comments
"दरख्तों की कांट छांट ने छीना मेरा साया,
तूफां आ गया तो' खुद न बचा पाया".

"छीन ली मेरी परवाज़ इन आबकारी किरणों ने,
मेरा आसमां भी इस' आलूदगी से' बच नहीं पाया".

"नहीं कोई गुनाहगार मेरा' सिवाए इब्ने आदम के,
मगर अफ़सोस' इस जुर्म का भी इर्तेकाब' वो कर नहीं पाया".

"ज़रा ग़ौर से देख' हम भी उस ख़ुदा की मख्लूक़ है,
जिसकी दुनिया को तू' संभाल नहीं पाया".

[सैय्यद परवेज़ अली] 




"जवाब-ए-शिकवा"

"अगर तू रोता है अपने आशियाँ के लिए ए परिंदे,
तो ढून्ड ज़रा अपनी मेहनत का सिला" अपने ही अमल में

"न कर कोई फरियाद इब्ने आदम से,
क्युकी वो भी तो मख्लूक़ है, कमज़ोर भी है और ख़ुदगर्ज़ भी".

"न चलेगा पता उसे' तेरी बर्बादी का,
क्युकी वो मिटाता ही है, औरो के घर' खुद बसने के लिए

याद रख, तू आज़ाद है,
और तेरी ताक़त, तेरी परवाज़ है".

[सैय्यदा अर्शी नाज़]


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