"न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ लोगों, तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी, दास्तानों में"
सन 1700, जब मुल्क में न'इत्तेफाकी, बदुन्वानी (Corruption), मुआशारती (social) मतभेद , आपसी रंजिश, फ़िर्क़े वारीयत(Racism) का बोल-बाला था! मुल्क-मुल्क न हो कर सूबों (province) और अलग-अलग रियासतों(state) में तक़सीम था! तब वतन दुश्मनों की बुरी नज़र का निशाना बना, फूट डालो और हुकूमत करो नीति काम कर गयी और East India Company का झंडा बुलंद हुआ!.
अंग्रेजी ज़ंजीर ने चारो और से इस मुल्क को जकड लिया फिर लाखो लोग शहीद हुए, हजारो घर फूँक दिए गए, इज्ज़त, आबरू तक नीलाम कर दी गयी हर तरफ ज़ुल्म ज्यातती का मंज़र आम था, जुबान ख़ामोश और सर झुके हुए थे. तब मस्जिदों, मंदिरों और गुरुद्वारों से गिडगिडाती हुई आवाज़ में दुआ के लिए हाथ उठे, फिर तकदीर -ए-हिंद का सितारा जगमगाया और एक आवाज़ बुलंद हुई, जिसकी आँखों में जूनून, जुबान पे कलमा और हाथो में दुश्मनों के खून की प्यासी तलवार थी, जब ये शेर-ए-मैसूर सुल्तान फ़तेह अली खान टीपू मैदान-ए-जंग में खड़ा हुआ तब ये गोरी चमड़ी वाले अपनी पीठ दिखा के भाग खड़े हुए मगर अफ़सोस घर के भेदी ने ही उस सुल्तान-ए -हिंद की रियासत को निस्त-ओ-नाबूद कर दिया मगर उसकी यलग़ार बरक़रार रही वक्तन फ वक्तन नौजवान-इ -हिंद मंगलपाण्डेय, रानीलक्ष्मी बायीं, अब्दुल कलाम आज़ाद, मुहम्मद अली जोहर, मुहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली, महमूद उल हसन, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान और राजगुरु जैसे शोले उभरते गए और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोलते गए!.
हमेशा की तरह मक्कार, फरेबी, चापलूसों ने मुल्क की आज़ादी के नाम पर सदियों लोगो को गुमराह किया और मुल्क के खजाने को गेरों के हाथो बेच दिया, और भीख में मिली खोकली आज़ादी से देश की लगाम अपने हाथ में ले कर बचा कुचा माल भी लूट लिया और देश को टुकड़े टुकड़े कर नफ़रत,हिंसा और ग़रीबी की आग लगा कर, मज़हब के नाम पर सियासत रोटियां पकाते चले गए!.
कभी अपने सोचा है की हमे आज़ादी मिली है या भीख मे दी गयी है और हम किस आज़ादी का जशन मना रहे है. क्या आपको पता है की हमारे मुल्क की अक्सरियत(majority) आज़ादी के 65 साल बाद भी ग़रीबी और भुकमरी का शिकार है, महगाई दिन ब दिन बढती ही जा रही है और लोग बेबस हो कर खुद्ख्शी कर रहे है, हमारे मुल्क की 60% से ज्यादा आबादी अभी तक तालीम ओ तरबियत(education) से दूर है, लोग इन्साफ की गुहार लगाते लगाते थक हार जाते है और जब उनका नंबर आता है तो उन्हें मरे अरसा बीत चुका होता है. अभी तक अक्सर कबीले(tribes)और जातिया मुख्यधारा -(mainstream) का हिस्सा नहीं बन पाए और वो आज भी उसी अंधेर नगरी में अपना गुज़र बसर कर रहे है. रोज़ ब रोज़ मज़हब के नाम पर दंगे फसाद हजारो लोगो की जान ले लेते है और दिलो में नफ़रत का बीज छोड़ जाते है, सियासी आतंकवाद साए की तरह हमारे सरो पर मंडरा रहा है जो कभी भी हमे अपनी चपेट में ले सकता है. आज भी हमारे पास वो ताक़त है की हम दोबारा अपने मुल्क को सोने की चिढिया बना सकते है लेकिन हमारा 70% पैसा कालेधन की शक्ल में वर्ल्ड बैंक में जमा है. पूरा सियासी और इन्तेज़मी निजाम(political &administrative system) भ्रष्ट होता जा रहा है और हमारे पास एक भी ऐसा नजरिया(ideology) नहीं जो मुल्क के लोगो को दोबारा से एक कर सके.
नौजवान पीड़ी नशा,सेक्स,जुर्म, जहालत और खुदखुशी का शिकार होती जा रही है और छोटी से छोटी बात पर हिंसा की दहाने पैर पहुच जाती है. योन शोषढ़,छेड़-छाड़ और बलात्कार तो अखबारों और T.V चेनलो के मनोरंजन का जरिया बन गया है, पूरा समाज वेस्टर्न तहज़ीब(Culture) का हिस्सा बनता जा रहा है और अपनी तहज़ीब को अपनाने में शर्मिंदगी महसूस कर रहा है. कहने वाले कह गए की "तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा" लेकिन खून के क़तरे निचोड़ लिए गए और जिस्म कमज़ोर कर दिया गया मगर अफ़सोस अभी तक आज़ादी नहीं मिली!.
ऐसा लगता है की हिंदुस्तान फिर उसी मुकाम पर खड़ा है जहाँ आज से 260 साल पहले था और शायद हम फिरसे ग़ुलाम बन्ने के लिए किसी East India Company का इंतज़ार कर रहे है!
सैय्यद परवेज़ अली
सन 1700, जब मुल्क में न'इत्तेफाकी, बदुन्वानी (Corruption), मुआशारती (social) मतभेद , आपसी रंजिश, फ़िर्क़े वारीयत(Racism) का बोल-बाला था! मुल्क-मुल्क न हो कर सूबों (province) और अलग-अलग रियासतों(state) में तक़सीम था! तब वतन दुश्मनों की बुरी नज़र का निशाना बना, फूट डालो और हुकूमत करो नीति काम कर गयी और East India Company का झंडा बुलंद हुआ!.
अंग्रेजी ज़ंजीर ने चारो और से इस मुल्क को जकड लिया फिर लाखो लोग शहीद हुए, हजारो घर फूँक दिए गए, इज्ज़त, आबरू तक नीलाम कर दी गयी हर तरफ ज़ुल्म ज्यातती का मंज़र आम था, जुबान ख़ामोश और सर झुके हुए थे. तब मस्जिदों, मंदिरों और गुरुद्वारों से गिडगिडाती हुई आवाज़ में दुआ के लिए हाथ उठे, फिर तकदीर -ए-हिंद का सितारा जगमगाया और एक आवाज़ बुलंद हुई, जिसकी आँखों में जूनून, जुबान पे कलमा और हाथो में दुश्मनों के खून की प्यासी तलवार थी, जब ये शेर-ए-मैसूर सुल्तान फ़तेह अली खान टीपू मैदान-ए-जंग में खड़ा हुआ तब ये गोरी चमड़ी वाले अपनी पीठ दिखा के भाग खड़े हुए मगर अफ़सोस घर के भेदी ने ही उस सुल्तान-ए -हिंद की रियासत को निस्त-ओ-नाबूद कर दिया मगर उसकी यलग़ार बरक़रार रही वक्तन फ वक्तन नौजवान-इ -हिंद मंगलपाण्डेय, रानीलक्ष्मी बायीं, अब्दुल कलाम आज़ाद, मुहम्मद अली जोहर, मुहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली, महमूद उल हसन, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान और राजगुरु जैसे शोले उभरते गए और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोलते गए!.
हमेशा की तरह मक्कार, फरेबी, चापलूसों ने मुल्क की आज़ादी के नाम पर सदियों लोगो को गुमराह किया और मुल्क के खजाने को गेरों के हाथो बेच दिया, और भीख में मिली खोकली आज़ादी से देश की लगाम अपने हाथ में ले कर बचा कुचा माल भी लूट लिया और देश को टुकड़े टुकड़े कर नफ़रत,हिंसा और ग़रीबी की आग लगा कर, मज़हब के नाम पर सियासत रोटियां पकाते चले गए!.
कभी अपने सोचा है की हमे आज़ादी मिली है या भीख मे दी गयी है और हम किस आज़ादी का जशन मना रहे है. क्या आपको पता है की हमारे मुल्क की अक्सरियत(majority) आज़ादी के 65 साल बाद भी ग़रीबी और भुकमरी का शिकार है, महगाई दिन ब दिन बढती ही जा रही है और लोग बेबस हो कर खुद्ख्शी कर रहे है, हमारे मुल्क की 60% से ज्यादा आबादी अभी तक तालीम ओ तरबियत(education) से दूर है, लोग इन्साफ की गुहार लगाते लगाते थक हार जाते है और जब उनका नंबर आता है तो उन्हें मरे अरसा बीत चुका होता है. अभी तक अक्सर कबीले(tribes)और जातिया मुख्यधारा -(mainstream) का हिस्सा नहीं बन पाए और वो आज भी उसी अंधेर नगरी में अपना गुज़र बसर कर रहे है. रोज़ ब रोज़ मज़हब के नाम पर दंगे फसाद हजारो लोगो की जान ले लेते है और दिलो में नफ़रत का बीज छोड़ जाते है, सियासी आतंकवाद साए की तरह हमारे सरो पर मंडरा रहा है जो कभी भी हमे अपनी चपेट में ले सकता है. आज भी हमारे पास वो ताक़त है की हम दोबारा अपने मुल्क को सोने की चिढिया बना सकते है लेकिन हमारा 70% पैसा कालेधन की शक्ल में वर्ल्ड बैंक में जमा है. पूरा सियासी और इन्तेज़मी निजाम(political &administrative system) भ्रष्ट होता जा रहा है और हमारे पास एक भी ऐसा नजरिया(ideology) नहीं जो मुल्क के लोगो को दोबारा से एक कर सके.
नौजवान पीड़ी नशा,सेक्स,जुर्म, जहालत और खुदखुशी का शिकार होती जा रही है और छोटी से छोटी बात पर हिंसा की दहाने पैर पहुच जाती है. योन शोषढ़,छेड़-छाड़ और बलात्कार तो अखबारों और T.V चेनलो के मनोरंजन का जरिया बन गया है, पूरा समाज वेस्टर्न तहज़ीब(Culture) का हिस्सा बनता जा रहा है और अपनी तहज़ीब को अपनाने में शर्मिंदगी महसूस कर रहा है. कहने वाले कह गए की "तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा" लेकिन खून के क़तरे निचोड़ लिए गए और जिस्म कमज़ोर कर दिया गया मगर अफ़सोस अभी तक आज़ादी नहीं मिली!.
ऐसा लगता है की हिंदुस्तान फिर उसी मुकाम पर खड़ा है जहाँ आज से 260 साल पहले था और शायद हम फिरसे ग़ुलाम बन्ने के लिए किसी East India Company का इंतज़ार कर रहे है!
सैय्यद परवेज़ अली

No Comment to " "इंक़लाब जिंदाबाद"" "