दुष्कर्म के विरोध में रतलाम बंद! कुछ देर पहले जब इस खबर पर नज़र गयी
तो दिल में एक सवाल पैदा हुआ! क्या शहर और कारोबार को बंद कर देने से इस
जुर्म पर क़ाबू पाया जा सकता है? या हुकूमत और अवाम को कुछ और क़दम उठाने कि
ज़रुरत है!
कुछ दिन पहले एक दिल दहला देने वाली ख़बर शाया हुई, कि एक 8वीं क्लास में पढ़ने वाले बच्चे ने एक 4 साल कि मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाया! लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये है कि एक 14,15 साल का बच्चा, इतनी शर्मनाक हरकत को कैसे अंजाम दे सकता है? इस सवाल का जवाब भी उस अख़बार कि ख़बर में छिपा था, कि मोबाइल पर अश्लील फ़िल्म देखने के बाद, उस बच्चे ने हैवानियत इख्तेयार कर एक मासूम कि ज़िंदगी तबाह कि!
इस हाईटेक और तरक्क़ी नुमा ज़माने में जहाँ मोबाइल सिर्फ बात करने और सुनने के लिए ही नहीं बल्कि मनोरंजन के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है! और जहाँ इंटरनेट और विडियो लाएब्रेरी गन्दी और वाहियात मटीरियल से भरी पड़ी है! जिसे किसी भी उम्र का बच्चा आसानी से देख कर अपनी मासूमियत को हैवानियत में बदल सकता है!
वैसे अब तो अश्लीलता कि तारीफ ही बदल दी गयी है! जो अदाकारा आइटम नंबर करती है या फिल्मो में बोल्ड सीन दे कर लोगो को मुतास्सिर करती है! वो आज कि नज़र में एक फन है - एक कला है! लेकिन क्या इस तरह कि फ़िल्मे ज़ेहनो पर बुरा असर नहीं डालती? क्या ये फहाश लड़कियां जो मॉडलिंग और एक्टिंग के नाम पर जिस्म कि नुमाइश करती है और वो मर्द जो इनसे ऐसे ज़लील काम करवाते है क्या वो सब इस जर्म को बढ़ावा नहीं दे रहे? क्या आर्ट और फेशन के नाम पर इंसानी ज़हन को ख़राब नहीं किया जा रहा? क्या इस तरह के ज़हन तैयार कर दुष्कर्म और आबरू रेज़ी जैसे घिनोने कामो को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा? क्या हुकूमत जुर्म कि सही सजा दे कर मुआशरे में अमन क़ायम कर रही है या उन्हें बढ़ावा दे रही है?
किसी किताब का उन्वान था कि आपके सवाल ही जवाब है! लेकिन क्या हमारे इस सवाल का जवाब यही है कि हम सड़को पर रैलियां निकाले, मोमबत्तियां जला कर अपने ग़ुस्से का इज़हार करें! या बाज़ार और शहर बंद करवा कर इस जुर्म कि मुख़ालिफ़त करें! क्या ये सब कर लेने से इस तरह के संगीन जुर्म बंद हो जाएंगे? क्या इससे इंसानी ज़ेहन जो हर जगह पर गन्दा बनाया जा रहा है उसमे कुछ कमी अ जाएगी?
अगर आपका जवाब न है तो मान लीजिये कि इस सवाल का जवाब अभी तक सही ढंग से नहीं खोजा गया! और अगर इस जुर्म को रोकने के लिए यही तरीक़े अपनाये गए तो इस सवाल का जवाब हमेशा एक राज़ ही बना रहेगा!
इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व ने एक बार फ़रमाया था: कि किसी कश्ती में कुछ मुसाफिर कश्ती के ऊपरी हिस्से में बैठे हो, और कुछ नीचे के! और अगर नीचे वाले मुसाफिरों को प्यास लगे और वो अपनी प्यास बुझाने के लिए कश्ती में छेद कर दें, और उन्हें ये करता देख ऊपर वाले मुसाफिर उन्हें न रोकें, तो वो सब हलाक हो जायेगें!
मुसन्निफ़: "सय्यद परवेज़ अली"
कुछ दिन पहले एक दिल दहला देने वाली ख़बर शाया हुई, कि एक 8वीं क्लास में पढ़ने वाले बच्चे ने एक 4 साल कि मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाया! लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये है कि एक 14,15 साल का बच्चा, इतनी शर्मनाक हरकत को कैसे अंजाम दे सकता है? इस सवाल का जवाब भी उस अख़बार कि ख़बर में छिपा था, कि मोबाइल पर अश्लील फ़िल्म देखने के बाद, उस बच्चे ने हैवानियत इख्तेयार कर एक मासूम कि ज़िंदगी तबाह कि!
इस हाईटेक और तरक्क़ी नुमा ज़माने में जहाँ मोबाइल सिर्फ बात करने और सुनने के लिए ही नहीं बल्कि मनोरंजन के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है! और जहाँ इंटरनेट और विडियो लाएब्रेरी गन्दी और वाहियात मटीरियल से भरी पड़ी है! जिसे किसी भी उम्र का बच्चा आसानी से देख कर अपनी मासूमियत को हैवानियत में बदल सकता है!
वैसे अब तो अश्लीलता कि तारीफ ही बदल दी गयी है! जो अदाकारा आइटम नंबर करती है या फिल्मो में बोल्ड सीन दे कर लोगो को मुतास्सिर करती है! वो आज कि नज़र में एक फन है - एक कला है! लेकिन क्या इस तरह कि फ़िल्मे ज़ेहनो पर बुरा असर नहीं डालती? क्या ये फहाश लड़कियां जो मॉडलिंग और एक्टिंग के नाम पर जिस्म कि नुमाइश करती है और वो मर्द जो इनसे ऐसे ज़लील काम करवाते है क्या वो सब इस जर्म को बढ़ावा नहीं दे रहे? क्या आर्ट और फेशन के नाम पर इंसानी ज़हन को ख़राब नहीं किया जा रहा? क्या इस तरह के ज़हन तैयार कर दुष्कर्म और आबरू रेज़ी जैसे घिनोने कामो को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा? क्या हुकूमत जुर्म कि सही सजा दे कर मुआशरे में अमन क़ायम कर रही है या उन्हें बढ़ावा दे रही है?
किसी किताब का उन्वान था कि आपके सवाल ही जवाब है! लेकिन क्या हमारे इस सवाल का जवाब यही है कि हम सड़को पर रैलियां निकाले, मोमबत्तियां जला कर अपने ग़ुस्से का इज़हार करें! या बाज़ार और शहर बंद करवा कर इस जुर्म कि मुख़ालिफ़त करें! क्या ये सब कर लेने से इस तरह के संगीन जुर्म बंद हो जाएंगे? क्या इससे इंसानी ज़ेहन जो हर जगह पर गन्दा बनाया जा रहा है उसमे कुछ कमी अ जाएगी?
अगर आपका जवाब न है तो मान लीजिये कि इस सवाल का जवाब अभी तक सही ढंग से नहीं खोजा गया! और अगर इस जुर्म को रोकने के लिए यही तरीक़े अपनाये गए तो इस सवाल का जवाब हमेशा एक राज़ ही बना रहेगा!
इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व ने एक बार फ़रमाया था: कि किसी कश्ती में कुछ मुसाफिर कश्ती के ऊपरी हिस्से में बैठे हो, और कुछ नीचे के! और अगर नीचे वाले मुसाफिरों को प्यास लगे और वो अपनी प्यास बुझाने के लिए कश्ती में छेद कर दें, और उन्हें ये करता देख ऊपर वाले मुसाफिर उन्हें न रोकें, तो वो सब हलाक हो जायेगें!
मुसन्निफ़: "सय्यद परवेज़ अली"
